शिवली: जागेश्वर महादेव मंदिर सावन विशेष: स्वयंभू हैं जागेश्वर महादेव मंदिर में विराजमान भोलेनाथ, महादेव करते भक्तों की मुरादें पूरी

ब्यूरो कानपुर देहात राहुल मिश्रा
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शिवली कानपुर देहात।


कानपुर देहात के पांडव नदी के तट पर बसा कस्बा शिवली। कस्बा शिवली और पांडव नदी के मध्य स्थित प्राचीन श्री जागेश्वर महादेव बाबा का अद्भुद स्थान, जो कस्बे की अपनी अलग पहचान कराते है। जागेश्वर महादेव मंदिर प्राचीन समय से ही क्षेत्रीय श्रद्धालुओं के बीच भक्ति, आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र है। यहां आने वाले समस्त भक्तों की मुरादें पूरी करते हैं बाबा भोलेनाथ जिसके कारण हर वर्ग में उनकी लोकप्रियता बनी हुई है। वर्तमान समय में यहां आसपास के विस्तार क्षेत्र से करीब आधा सैकड़ा गांवों के भक्त नियमित पूजन करते हैं। इसके अलावा यहां दूर दराज के इलाकों से भी काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। सामान्य दिनों में यहां सप्ताह में दो दिन सोमवार व शनिवार को भक्तों की भीड़ अच्छी खासी संख्या में जुटती है। वहीं, तीज त्योहारों सहित विशेष रूप से सावन के महीने में प्रतिदिन बाबा भोलेनाथ का विभिन्न प्रकार से श्रृंगार किया जाता है जिससे इसकी रौनक देखने लायक होती है।


जागेश्वर महादेव मंदिर में विराजमान भोलेनाथ 


             कस्बा शिवली, जिसका नामकरण भोलेनाथ की शिवलिंग के आधार पर पड़ा। शिव मंदिरों में शिवली कस्बा का प्राचीन मंदिर जागेश्वर अपने में कई रहस्य समेटे है। इसे स्थापित नही किया गया है, बल्कि यह स्वयं प्रकट हुआ है। शिवलिंग के बारे में मान्यता है कि ये सीधे पाताल से जुड़ा है। भक्तों की अगाध आस्था है। इस प्राचीन मंदिर का इतिहास कितना पुराना है यह किसी को नहीं पता सभी श्रद्धालुओं के अपने अलग-अलग मत है।

कस्बे के कुछ वयोवृद्ध बताते है कि यह मंदिर करीब 500 वर्ष पुराना हैं। इस मंदिर का जीर्णोद्धार करीब 18वीं शताब्दी में देवनाथ दुबे और स्थानीय निवासियों के सहयोग से कराया गया था। 


 शिवलिंग के प्रकट होने की प्राचीन कथा


स्थानीय निवासी रामसेवक पांडेय, देवकीनंदन अवस्थी, गणेश शंकर, अशोक, दिनेश, रामऔतार, महेश पाण्डे, चंद्र कुमार आदि बताते हैं कि कई वर्षो पूर्व कस्बा शिवली के उत्तर दिशा में एक विशालकाय घने जंगल से युक्त एक टीला हुआ करता था। एक बंजारे की टोली इसी टीले के पास गायों को चराया करतीं थीं। टीले पर बंजारों की गाय रोज एक खास जगह पर अपने आप दूध गिरा देती थी जो कि बंजारों के लिए आश्चर्य की बात थी। एक दिन बंजारों जिस स्थान पर गाय अपना दूध गिराती थी उस जगह की खुदाई की, जहां से एक दिव्य शिवलिंग प्रकट हुआ हालांकि शिवलिंग का दूसरा छोर नहीं मिला। मान्यता है कि यह सीधे पाताल तक जाता है। इसी प्रकट हुए शिवलिंग के नाम पर इस पूरी जगह और कस्बे का नाम 'शिवली' रखा गया और उसी स्थान पर मंदिर की स्थापना की, तब यहां घने जंगल का एक टीला हुआ करता था। टीले के आसपास काफी कम आबादी हुआ करती थी। मंदिर में धीरे-धीरे बहुत से परिवर्तन हुए और बाद में इसका जीर्णोंद्धार कर नया स्वरूप दिया गया। तब से लेकर अब तक शिव मंदिर में कस्बे के साथ ही आसपास के गांवों के सभी लोगों की काफी अटूट आस्था है। यहां सभी पर्वो पर श्रद्धालु एकजुट होकर भव्य आयोजन करते हैं। कस्बा शिवली स्थित इस मंदिर का इतिहास कितना पूरा है इसका कोई भी प्रमाणित साक्ष्य नहीं मिला। सबसे पहले यहां छोटे मंदिर में केवल एक शिवलिंग जो स्वयं से प्रकट हुआ था स्थापित था। वर्तमान समय में इसके स्वरूप को और अधिक आकर्षित बनाकर सभी देवी देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित कर दी गईं।


मंदिर में स्थित तालाब



 सावन में विशेष कार्यक्रम और श्रृंगार


इस मंदिर में विशेष रूप से सावन के पावन महीने में कई तरह की विशिष्ट तैयारियां की जाती हैं। इसमें सबसे पहले भगवान शिव की प्रतिमा पर जलाभिषेक व पूजन का प्रबंध किया जाता है। सावन के महीने में गंगाजल लेकर आने वाले शिवभक्त कांवड़ियों के ठहरने व प्रसाद भोजन की भी उचित व्यवस्था की जाती है। सावन के माह में यहां भक्तों की भीड़ अन्य दिनों के मुकाबले काफी अधिक बढ़ जाती है। ऐसे में श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए भी यहां अतिरिक्त सेवादार तैनात किए जाते हैं। जब कभी कोई पर्व होता है, तब यहां खास पूजन रखवाए जाते हैं।

इस प्राचीन श्री शिव मंदिर में काफी संख्या में लोगों की मान्यता है। ऐसे में यहां दूर दराज के क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालुओं की भी संख्या अच्छी खासी रहती है। वर्षो से यह मंदिर भक्तों की परम आस्था का प्रतीक बना हुआ है, जिनका मानना है कि जो सुकून महादेव मंदिर में मिलता है ऐसा सुकून और कहीं नहीं मिल पाता।


मंदिर का प्रवेश द्वार


 सावन माह में प्रत्येक वर्ष आयोजित होता है बाबा का विशेष श्रृंगार एवं भजन संध्या


कस्बे के ही निवासी विमलेश अग्निहोत्री, नीलू त्रिवेदी, ओमी बाजपेई, अभिषेक, सूरज, शिवम आदि बाबा के भक्त बताते हैं कि सावन मास में ॐ नमः शिवाय कमेटी के तत्वाधान में जागेश्वर महादेव का प्रत्येक दिन विभिन्न प्रकार से श्रृंगार किया जाता हैं। शाम के वक्त नित्य ॐ नमः शिवाय का जप श्रद्धालुओं द्वारा पूरे श्रद्धा भाव के साथ सामूहिक रूप से किया जाता है। सावन के विश्राम दिवस पर भजन संध्या के साथ ही बाबा भोलेनाथ का पवित्र अमरनाथ गुफा के स्वरूप में श्रृंगार किया जाता है जो भक्तों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र होता है। इस आकर्षण को देखने के लिए कानपुर देहात, कानपुर नगर, उन्नाव, औरैया आदि जिलों से हजारों की संख्या में भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है।


 पंडित, मंदिर के मुख्य पुजारी


मंदिर के मुख्य पुजारी, भक्तों व ईश्वर के बीच की दूरी कम करने का माध्यम होते हैं, इसी कड़ी में जागेश्वर महादेव मंदिर मंदिर वर्षो से एक माध्यम बना हुआ है। यहां के महंत बाबा राकेश पूरी बताते हैं यह मंदिर कितना पुराना है इसकी सच्चाई उनको भी नहीं पता है। प्रत्येक सावन मास में भोलेनाथ का एक विशेष भक्त काला सर्प प्रतिदिन बाबा के दर्शन करने आता है। सर्प के लिए भक्त प्रतिदिन एक प्याले में दूध रखते हैं। सर्प उस दूध को पीने के बाद चला जाता है। इस विशेष शिव भक्त को आते तो सभी देखते हैं लेकिन जाता कहां है आज तक किसी ने नहीं देखा। शिवभक्त, कांवड़िए सावन में यहां अपनी आस्था के चलते जलाभिषेक करने आते हैं। भगवान शिव भक्तों का उचित मार्गदर्शन कर उन्हें सदैव हितकारी मार्ग दिखाते हैं।

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